आतंकवादियों के लिए आंसू क्या खोई राजीतिक जमीन वापिस दिला पाएंगे


आतंकवादियों के लिए आंसू क्या खोई राजीतिक जमीन वापिस दिला पाएंगे

         --राजेन्द्र भगत--
जम्मू कश्मीर में कुछ राजनीतिक पार्टियों की जमीन जब खिसकने लगती है तो वह आतंकवादियों के लिए घड़ियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं पिछले तीन दशकों से आतंकवाद की ज्वाला में दहक रहे कश्मीर मुद्दे को खुद की सियासतदानों ने सुलझने नहीं दिया जब जब चुनाव आए आतंकियों पर सियासत करने वाली राजनीतिक पार्टियों ने मौका देखकर चौका मारा है जब सत्ता में होती हैं तो अपना समय ऐशो आराम में काट देते हैं और यूं ही सत्ता से बाहर होते हैं तो अलगाववाद एवं आतंकवाद की पैरवी करते हैं ताकि उस दहशत परोसने वालों का साथ लेकर राज्य की जनता पर दबाव बनाकर चुनाव जीते जा सके आखिर क्या कारण है कि इतने वर्षों से जारी आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सका यदि सरकार से बाहर होते हुए यह कहा जाता है कि केंद सरकारों ने राज्य के लिए कुछ नहीं किया,विकास, रोजगार  उपलब्ध नही करवाएं तो फिर जब उनकी स्वयं की पार्टियां सत्ता में थी तो उन्होंने बेरोजगारों के लिए क्या किया  विकास के लिए क्या किया आखिर जनता तो पूछेगी।
                   
               इतने वर्ष बीत गए पर क्या किसी नेता को यह खबर है कि आज भी राज्य के हजारों दिहाड़ी दार मजदूर बिना वेतन के सरकारी नौकरी करने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि उनकी बकाया सैलरी या कभी ना कभी तो मिलेंगी जब जब राज्य में राज्यपाल शासन लगता है तो यह लोग मिठाइयां बांटते हैं उन्हें उम्मीद होती है कि अब इस राज्य पर कानून का राज होगा और उन्हें उनके हक मिलेंगे इतिहास गवाह है कि राज्य में जो भी प्रगति हुई है वह राज्यपाल शासन के कार्यकाल में ही हुई है इसीलिए राज्य की जनता का राजनीतिक पार्टियों से मोहभंग हो चुका है सत्ता से बाहर होते ही राजनीतिक पार्टियां खूब हल्ला करती हैं कि जम्मू-कश्मीर के साथ अन्याय हुआ है पर सत्ता में रहते हुए वह उस अन्याय को क्यों दूर नहीं कर पाते अब तो जनता यह भी कहने लगी है कि यह चंद राजनीतिक पार्टियां जम्मू कश्मीर मुद्दे को इसलिए उलझाए रखना चाहती हैं ताकि मौका आने पर सत्ता प्राप्त कर सकें पर लगता नहीं कि अब यह चाल बाजी लंबे समय तक चलेगी क्योंकि जनता इन राजनीतिक पार्टियों की सच्चाई जान चुकी है इन राजनीतिक पार्टियों को आतंकवादियों का दर्द तो दिखता है पर वर्षों तक अपने हक के लिए हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों का दर्द नहीं दिखता यह वही कर्मचारी हैं जिन्हें बिना सैलरी के या मात्र 4000 के लिए कई कई वर्षों तक अपना परिवार चलाना पड़ता है इन नेताओं को यह भी खबर नहीं कि इनमें से कितने ऐसे मजबूर लोगों ने खुदकुशी कर ली उनके परिवार आज किस तरह जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं इन्हें तो मात्र आतंकवादियों और उनके परिवारों की ही चिंता है

        अगर आज के दौर को देखा जाए तो आतंकवाद ने भी बड़ी बड़ी राजनीतिक पार्टियों की विचारधाराएं बदल दी हैं वह भी शायद मानने लगी है कि आतंकवाद को हथियार बनाकर सत्ता पर कब्जा किया जा सकता है दुनिया में चल रही है आतंकवाद पर जंग और उस जंग में एक पक्ष आतंकवादियों के साथ और दूसरा उसके विरोध में लड़ रहा है इतना ही नहीं इस जंग में तो कई कई देश भी आतंकवाद का साथ दे रहे हैं शायद वह समझने लगे हैं कि इस हथियार से दुनिया पर राज किया जा सकता है यदि ऐसी सोच दुनिया पर राज करने वाले की हो सकती है तो इस आतंकवाद के सहारे क्या किसी राज्य या किसी देश पर राजनीतिक कब्जा नहीं किया जा सकता अक्सर आतंकवादियों के प्रति आने वाले राजनीतिक ब्यान और उन बयानों का विरोध करने वाले तथा उन बयानों का साथ देने वाली पार्टियां जब आतंकवादियों का किसी ना किसी रूप में समर्थन करती हैं तो समझा जा सकता है कि खुद को संविधान और देशभक्त कहने वाली बड़ी-बड़ी पार्टियां भी कुख्यात आतंकवादियों का किसी ना किसी ढंग से समर्थन करती हैं जिसका मकसद केवल और केवल सत्ता के शिखर तक पहुंचना है
               बदले माहौल में जब इंटरनेट और अंतरिक्ष में सेटेलाइट की स्पीड पहले से हजारों गुना तीव्र हुई है जब 12 वर्ष का बच्चा भी वैज्ञानिक  यह प्रोफेसर बन रहा है ऐसे युग में देश की जनता को बेवकूफ बनाना असंभव है असंभव ही नहीं नामुमकिन भी।
__राजेन्द्र भगत,राज्य प्रमुख जम्मू कश्मीर, आल इंडिया प्रेस परिषद
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